संदेश

नवंबर 5, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पत्रकारिता: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आजकल विफल क्यों है?

     पत्रकारिता सिर्फ़ समाचार देने का माध्यम नहीं है । बल्कि विचारों और सत्य की आवाज़ है। यह समाज का आईना है, जो शासन की नीतियों, जनता की समस्याओं और सच्चाई के बीच पुल का काम करती है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बाद इसी का स्थान आता है। इसी कारण पत्रकारिता को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा गया है। पत्रकारिता का इतिहास भारत में पत्रकारिता की शुरुआत 1780 में ‘हिक्कीज़ बंगाल गजट’ से हुई। यह वह दौर था जब ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को उजागर करने वाला हर लेख एक क्रांति बन जाता था। धीरे-धीरे हिंदी, उर्दू और अन्य भाषाओं में भी अख़बारों की शुरुआत हुई — जिन्होंने जनता को जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम की नींव मजबूत की। इसी कारण अंग्रेजी सरकार इसे दबाने के लिए कठोर नियम बनाये लेकिन पत्रकारिता जिंदा रही आज के दौर में इसके कई रुप हो गयें है। भारत की आज़ादी में पत्रकारिता और प्रेस का योगदान भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक क्रांति की लहर पैदा की है। बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ से “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का नारा दि...

बिहार की राजनीति

चित्र
  🗳️ बिहार की राजनीति: आज़ादी से आज तक का सफर (गहरा विश्लेषण) बिहार की राजनीति का पूरा इतिहास — कांग्रेस के दौर से लेकर जेपी आन्दोलन, मंडल राजनीति, लालू-राबड़ी युग, नितीश कुमार के ‘सुशासन’ और आज की नई राजनीतिक धाराओं तक। एक गहरा विश्लेषण जो बताता है कि कैसे जाति, विकास और सामाजिक न्याय ने बिहार को आकार दिया। 🌾 प्रस्तावना: बिहार और राजनीति – एक गहरी कहानी अगर आप भारत की राजनीति की आत्मा को समझना चाहते हैं, तो बिहार को समझना जरूरी है। यहाँ हर चुनाव सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज की गहरी परतों का आईना होता है। देश की दिशा बदलने वाले कई बड़े आन्दोलन और नेता इसी धरती ने दिए हैं। बिहार की राजनीति को समझना मुश्किल है, क्योंकि यहाँ जाति हमेशा से राजनीतिक समीकरणों की केंद्रीय धुरी रही है। अगर आप बिहार की राजनीति को शुरू से अब तक गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। 🏛️ चरण 1: आज़ादी के बाद – कांग्रेस का दौर (1947–1960   ) आज़ादी के बाद, देश की तरह बिहार में भी कांग्रेस का दबदबा था। इस दौर के सबसे बड़े नेता थे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (बिहार केसरी) — बिहार के पह...

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भारत में अधिकतर कृषकों के लिए कृषि जीवन - निर्वाह का एक सक्षम स्त्रोत नहीं रही हैं । क्यों ?

डिजिटल गर्ल फ्रेंड( Digital Girlfriend )

शिक्षा का राजनीतिकरण (Politicization Of Education)

किसानों के बिना न्यू इंडिया का सपना अधूरा है ।