पत्रकारिता: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आजकल विफल क्यों है?

     पत्रकारिता सिर्फ़ समाचार देने का माध्यम नहीं है । बल्कि विचारों और सत्य की आवाज़ है। यह समाज का आईना है, जो शासन की नीतियों, जनता की समस्याओं और सच्चाई के बीच पुल का काम करती है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बाद इसी का स्थान आता है। इसी कारण पत्रकारिता को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा गया है। पत्रकारिता का इतिहास भारत में पत्रकारिता की शुरुआत 1780 में ‘हिक्कीज़ बंगाल गजट’ से हुई। यह वह दौर था जब ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को उजागर करने वाला हर लेख एक क्रांति बन जाता था। धीरे-धीरे हिंदी, उर्दू और अन्य भाषाओं में भी अख़बारों की शुरुआत हुई — जिन्होंने जनता को जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम की नींव मजबूत की। इसी कारण अंग्रेजी सरकार इसे दबाने के लिए कठोर नियम बनाये लेकिन पत्रकारिता जिंदा रही आज के दौर में इसके कई रुप हो गयें है। भारत की आज़ादी में पत्रकारिता और प्रेस का योगदान भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक क्रांति की लहर पैदा की है। बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ से “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का नारा दि...

बिहार की राजनीति

 

🗳️ बिहार की राजनीति: आज़ादी से आज तक का सफर (गहरा विश्लेषण)

बिहार की राजनीति का पूरा इतिहास — कांग्रेस के दौर से लेकर जेपी आन्दोलन, मंडल राजनीति, लालू-राबड़ी युग, नितीश कुमार के ‘सुशासन’ और आज की नई राजनीतिक धाराओं तक। एक गहरा विश्लेषण जो बताता है कि कैसे जाति, विकास और सामाजिक न्याय ने बिहार को आकार दिया।

🌾 प्रस्तावना: बिहार और राजनीति – एक गहरी कहानी

अगर आप भारत की राजनीति की आत्मा को समझना चाहते हैं, तो बिहार को समझना जरूरी है।
यहाँ हर चुनाव सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि समाज की गहरी परतों का आईना होता है।
देश की दिशा बदलने वाले कई बड़े आन्दोलन और नेता इसी धरती ने दिए हैं।
बिहार की राजनीति को समझना मुश्किल है, क्योंकि यहाँ जाति हमेशा से राजनीतिक समीकरणों की केंद्रीय धुरी रही है।

अगर आप बिहार की राजनीति को शुरू से अब तक गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।



🏛️ चरण 1: आज़ादी के बाद – कांग्रेस का दौर (1947–1960 )

आज़ादी के बाद, देश की तरह बिहार में भी कांग्रेस का दबदबा था।
इस दौर के सबसे बड़े नेता थे डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (बिहार केसरी) — बिहार के पहले मुख्यमंत्री।

• इस दौर का फोकस था राष्ट्र निर्माण।

• ज़मींदारी प्रथा खत्म की गई

• बरौनी रिफाइनरी जैसी इंडस्ट्री स्थापित हुई

• राजनीति पर ऊँची जातियों का नियंत्रण था

• शासन अपेक्षाकृत स्थिर रहा

चरण 2: बदलाव की लहर और जेपी आन्दोलन (1970s)

1960s के अंत तक कांग्रेस का गढ़ कमजोर होने लगा।
इसी दौर में कर्पूरी ठाकुर उभरे, जिन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू किया।
यह बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत थी।

लेकिन सबसे बड़ा मोड़ था 1974 का जेपी आन्दोलन —
जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा दिया और इसका केंद्र बना बिहार।

यहीं से उभरे वे नेता जिन्होंने अगले कई दशकों तक बिहार पर राज किया:
👉 लालू प्रसाद यादव
👉 नितीश कुमार
👉 राम विलास पासवान
👉 सुशील मोदी



⚖️ चरण 3: मंडल, सामाजिक न्याय बनाम ‘जंगल राज’ (1990–2005)

1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन लागू किया —
और इसके बाद बिहार की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।

लालू प्रसाद यादव बने इस दौर का चेहरा।
उन्होंने सामाजिक न्याय का नारा दिया और MY (मुस्लिम-यादव) गठबंधन बनाया।
हालाँकि, शासन के दौरान ‘जंगल राज’, भ्रष्टाचार और विकास की कमी के आरोप लगे।

👉 ‘चारा घोटाला’ जैसे स्कैंडल
👉 शिक्षा व स्वास्थ्य की उपेक्षा
👉 अति-पिछड़ी जातियों की उपेक्षा
इन सबने इस दौर की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।

🛠️ चरण 4: ‘सुशासन बाबू’ का युग (2005–2020)

2005 में जनता ने बदलाव चाहा —
और नितीश कुमार उभरे एक नए नेता के रूप में, BJP के साथ गठबंधन कर।

मुख्य उपलब्धियाँ:

सड़क, बिजली, शिक्षा, और सुरक्षा में सुधार

लड़कियों के लिए साइकिल योजना

पंचायती राज में महिलाओं को आरक्षण

उनका नारा था: सुशासन।
लेकिन शराबबंदी (2016) उनकी सबसे विवादित नीति रही,
जिससे अवैध कारोबार, भ्रष्टाचार और ज़हरीली शराब की घटनाएँ बढ़ीं।

🔍 चरण 5: आज की राजनीति – नयी पीढ़ी, नये मुद्दे (2020–वर्तमान)

बिहार की राजनीति अब एक संक्रमण के दौर में है।

तेजस्वी यादव ने ‘रोज़गार’ को नया मुद्दा बनाया —
यह जाति से हटकर एक नई सोच की शुरुआत थी।

बीजेपी राज्य में मजबूत हुई है, लेकिन ‘डबल इंजन’ मॉडल पर सवाल बने हुए हैं।
नितीश कुमार की पकड़ कमजोर पड़ी है, और ‘सुशासन’ पर सवाल उठ रहे हैं।

प्रशांत किशोर का ‘जन सूरज’ आंदोलन नई उम्मीद के रूप में उभरा है,
जो पारंपरिक जातिगत राजनीति से हटकर व्यवस्था-परिवर्तन की बात करता है।

🎓 विशेष फोकस: बिहार की शिक्षा व्यवस्था क्यों विफल हुई?

बिहार की शिक्षा व्यवस्था का पतन 1980–2000 के बीच हुआ।
मुख्य कारण:

शासन की उपेक्षा

नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप

‘नकल माफिया’ की संस्कृति

कम वेतन वाले ‘पैरा टीचर’

प्रतिभा पलायन (Brain Drain)

हालाँकि हाल की सरकारों ने कुछ सुधार किए हैं,
लेकिन दशकों की क्षति की भरपाई अभी भी चुनौती है।

🧭 निष्कर्ष: पहचान बनाम विकास की राजनीति

बिहार ने देखा है —
कांग्रेस का स्थिर शासन,
कर्पूरी ठाकुर का सामाजिक बदलाव,
लालू यादव का सामाजिक न्याय,
और नितीश कुमार का सुशासन।

आज भी जाति एक सच्चाई है, लेकिन बिहार का युवा अब नौकरी और बेहतर ज़िन्दगी की मांग कर रहा है।
आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि बिहार की राजनीति पहचान की राजनीति (Identity Politics) से निकलकर
विकास की राजनीति (Aspirational Politics) की ओर कितनी आगे बढ़ती है।

   बिहार की राजनीति का सफर जितना पुराना है, उतना ही जटिल —
लेकिन इसी जटिलता में लोकतंत्र की असली कहानी छिपी है।

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