पत्रकारिता सिर्फ़ समाचार देने का माध्यम नहीं है । बल्कि विचारों और सत्य की आवाज़ है। यह समाज का आईना है, जो शासन की नीतियों, जनता की समस्याओं और सच्चाई के बीच पुल का काम करती है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बाद इसी का स्थान आता है। इसी कारण पत्रकारिता को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा गया है। पत्रकारिता का इतिहास भारत में पत्रकारिता की शुरुआत 1780 में ‘हिक्कीज़ बंगाल गजट’ से हुई। यह वह दौर था जब ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को उजागर करने वाला हर लेख एक क्रांति बन जाता था। धीरे-धीरे हिंदी, उर्दू और अन्य भाषाओं में भी अख़बारों की शुरुआत हुई — जिन्होंने जनता को जागरूक किया और स्वतंत्रता संग्राम की नींव मजबूत की। इसी कारण अंग्रेजी सरकार इसे दबाने के लिए कठोर नियम बनाये लेकिन पत्रकारिता जिंदा रही आज के दौर में इसके कई रुप हो गयें है। भारत की आज़ादी में पत्रकारिता और प्रेस का योगदान भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक क्रांति की लहर पैदा की है। बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ से “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का नारा दि...
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" Sound of 💟 " दिल की आवाज "
" दिल की सुनो और वहीं करो जो आप चाहते हो "
Its blog started in September 2017 by Amlesh Prasad . It is a sound of 💟 . Its write articles and hindi literature nd something different story. Only follow heart of Aam Admi nd observe then write dil ki baate eg :-
Read poltical articles , motivational quotes , prose , shayari and poetry .
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ब्लॉग के बारे में :)
" Sound of 💟 " दिल की आवाज "
" दिल की सुनो और वहीं करो जो आप चाहते हो "
इस ब्लॉग की शुरुआत सितम्बर 2017 में हुआ था । इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य हैं । भारत और विदेशों में हिन्दी कहानी , लेख , कविता और शायरी को हिन्दी प्रेमियों तक पहुँचाना और मोटीवेट करना साथ ही साथ गाँव समाज और आम आदमी के दिलों की बात को अपने पाठकों तक पहुँचाना ।
नोट :) इसके अन्य वर्ग हैं । आप आसानी से अलग - अलग प्रकार के लेख पढ़ सकते हैं । आपको Categories पर Click कर के अपने मन पसंद विषय का चुनाव करना होगा । कुछ इस प्रकार हैं... ।
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भारत में अधिकतर कृषकों के लिए कृषि जीवन - निर्वाह का एक सक्षम स्त्रोत नहीं रही हैं । क्यों ?
भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जाहिर सी बात हैँ कि यहाँ की अधिक अबादी कृषि पर निर्भर हैं और आजादी से पहले भी थी । यह अबादी आज भी और आजादी से पहले भी अपना जीवन - निर्वाह कृषि से करती थी लेकिन यह अधिकतर कृषकों के लिए जीवन - निर्वाह का एक सक्षम स्त्रोत नहीं रही हैं । आजादी से पहले भारतीय किसानों को अंग्रेजों के द्वारा करीब 150 साल किसी न किसी फसल के लिए मजबूर किया गया । जैसे - नील की खेती , पटसन , चाय , कपास इत्यादि इसका खामियाजा भारतीय किसानों को भुगतना पड़ा उनकी जमीन बंजर हो गई और और दूसरी फसल नहीं होती थी जिसके कारण इनका जीवन - निर्वाह दुर्लभ हो गया और देश के कई भागों में अकाल पड़ गया । जिसमें बंगाल मुख्य था । ऊपर से अंग्रेजों के द्वारा भारतीय किसानों के फसलों पर लगाया गया लगान ( कर ) वसुली से तंग आकर कृषि से मुँह मोड़ लिए क्योंकि अब जीवन - निर्वाह करना मुश्किल हो गया और अंततः पलायन कर गये । 15 अगस्त 1947 को देश ...
डिजिटल गर्ल फ्रेंड( Digital Girlfriend )
यह कहानी 15 मई 2017 को प्रतिलिपि Online Magazine में Published हुआ था । जिसे 4000 से भी ज्यादा पाठकों द्वारा पढ़ा गया और यह कहानी टाँप 20 कहानियों में चयनित हुई थी ।आज मै अपने द्वारा लिखित कहानी 'डिजिटल गर्ल फ्रेंड ' अपने Blog पर Published कर रहा हूँ । आज इस आधुनिक और सोशल मीडिया के युग में भला कौन पीछा रहना चाहता हैं । हमारी दोस्ती की पाठशाला यही से शुरुआत होती हैं , इसी सोशल मीडिया युग की अनोखी कहानी है , डिजिटल गर्ल फ्रेंड सूरज और चांदनी दोनों एक छोटे शहर से निकल कर झीलों की नगरी ' भोपाल ' मे उच्च शिक्षा ग्रहण करने आये । दोनों एक नामी इंजीनियरिंग कालेज मे नामांकन लिए यही दोनों की मुलाकात कालेज के कैंटीन मे होती हैं । सूरज - आप का नाम क्या हैं आप को कालेज मे कभी देखा नहीं ? चांदनी - मैं इसी माह से कालेज आ रही हूँ शायद आप नहीं देखे हो , वैसे मेरा नाम चांदनी है और आपका । सूरज - मेरा नाम सूरज हैं । चांदनी - आप किस ब्रांच के हैं । सूरज - मेरा EC ब्रांच ...
शिक्षा का राजनीतिकरण (Politicization Of Education)
यदि देश में शिक्षा की स्थिति का आकलन करें तो दयनीय है। विशेष रूप से अगर प्राथमिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा को देखा जाए तो पूर्ण रूप से इसका राजनीतिकरण हो गया है। इसका शिकार कोई और नहीं देश का वह गरीब तबका होता है जो सरकारी विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करता हैं । देखा जाए तो सरकारी विद्यालयों के बच्चों पर मात्रृभाषा या क्षेत्रीय भाषा का बोझ ऐसे डाल दिया जाता है जैसे इसकी जिम्मेदारी सिर्फ इन बच्चों की हैं । बचपन में जब इसकी जिम्मेदारी मुझे मिलीं तो मुझे भी बहुत खुशी हुई थी होना भी चाहिए । एक बार हिन्दी पढ़ लेने के बाद कोई कितना भी अंग्रेजी पढाये लेकिन वो हिन्दी वाली फिलींग आती नही है । एक समय आता हैं हमें पता चलता हैं कि हायर शिक्षा में अंग्रेजी के बिना दाल नही गलने वाली फिर यहाँ से हम अंग्रेजी सिखना शुरू करते है क्योंकि आगे का सफर बिना अंग्रेजी के नहीं चलने वाली अब हम हिन्दी से निकल कर अंग्रेजी के नौका पर सफर करतें हैं जो एंजवाय करते हुए इसे सिख जातें हैं उसकी नैया पार हो जाती है नहीं तो जिंदगी भर उलझन बनी रहती है । प्राथमिक शिक्षा हर बच्चें का अधि...
किसानों के बिना न्यू इंडिया का सपना अधूरा है ।
भारत युवाओं का देश हैं और जहाँ तक युवाओं की बात हैं तो युवाओं ने अपने तरफ से हर कोशिश किए हैं और कर रहे हैं । भारत की नई उड़ान हैं हम ..! हम में हैं दम बदलकर रहेंगे किसानों की खराब स्थिति को हम ..!! ~ युवा उद्यमी लेकिन किसानों को अनदेखी कर रही है सरकार और न्यू इंडिया बनाने की कल्पना करती हैं । आजकल देश में जो स्थिति किसानों की हैं वैसी किसी और की नहीं हैं और होना भी नहीं चाहिए । किसान साहूकार से कर्ज लेकर या तो शहर पलायन कर रहे हैं या विदेश दोनों जगह मजदूरी पर निर्भर हैं या कहे तो पूर्ण रुप से ठगा महसूस कर रहे हैं और सरकार नींव इंडिया की सपना देख रही हैं । इनकी स्थिति इतनी खराब हो गई हैं कि हर साल आत्महत्या के आँकड़े बढ़ते जाते हैं लेकिन किसानों को समझना चाहिए आत्महत्या इस...
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