नैनीताल यात्रा

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  नैनीताल यात्रा: नैनीताल में घूमने लायक सभी जगहों की पूरी जानकारी नैनीताल सिर्फ़ एक हिल स्टेशन नहीं है, बल्कि यह झीलों, मंदिरों, पहाड़ों, व्यू पॉइंट्स और शांति से भरा एक पूरा अनुभव है। अगर आप पहली बार नैनीताल जा रहे हैं और चाहते हैं कि कोई भी जगह छूटे नहीं, तो यह ब्लॉग आपके लिए Complete Travel Guide है। 🚆 काठगोदाम: यात्रा की शुरुआत काठगोदाम रेलवे स्टेशन नैनीताल का प्रवेश द्वार है। दिल्ली, लखनऊ और अन्य बड़े शहरों से यहाँ सीधी ट्रेन मिल जाती है।       • समय : दिल्ली से काठगोदाम 7-8 घंटे [ रेल यात्रा ] स्टेशन के बाहर टैक्सी और बस आसानी से मिल जाती हैं। नोट : 1. ज्यादा सुबह यात्रा करते हैं या रात्रिकालीन में तो इसका ध्यान रखे की चालक मानसिक रूप से स्वस्थ तथा अनुभवी चालक होना चाहिए ताकि यात्रा में जोखिम का खतरा कम रहे । कोशिश करें की यात्रा दिन में करें।  2. उल्टी करने वालें व्यक्ति यात्रा शुरू करने से पहले उल्टी नहीं होने वाली दवाई आधा घंटा पहले खाकर । बिना डरें यात्रा की शुरुआत कर सकते हैं।  🛕 1. कैंची धाम (Neem Karoli Baba Mandir) काठगोदाम से निकलते ही रास...

राजनीति का बदलता परिदृश्य ( भाग - 2 )

  गांधी जी इस सत्याग्रह तक ही नहीं ठहरे इसके बाद वो अहमदाबाद मिल हड़ताल के समर्थन के लिए अहमदाबाद पहुंचे वहाँ मिल मजदूरों के समर्थन में खड़ा रहे। 

            जबकि आज कई सारी कंपनियों में सस्ते श्रमिक के नाम पर सुबह से शाम तक बहुत कम वेतन मे खटाया  जाता है ना रहने की व्यवस्था ना खाने की सही व्यवस्था, खाने के नाम पर एक समय खानापूर्ति की जाती हैं। ये श्रमिक देश के विकास मे योगदान देते हैं फिर इनके साथ हो रहा अन्याय किसी को नहीं दिखता हैं आखिर क्यों? 
    राजनीतिक इच्छा शक्ति रहती तो कोई ना कोई राजनेता इनके लिए जरूर आता। सिर्फ चुनाव के समय आकर इनकी बातों को सुनना राजनीतिक स्वार्थ की ही बात हैं। 

गांधी जी का अगला पड़ाव खेड़ा सत्याग्रह हैं। जहाँ किसानों से अधिक लगान वसूलने का मामला सामने आया है। गांधी जी सरदार पटेल के साथ मिलकर खेड़ा के किसानों से लगान ना देने का अनुरोध किया । अंततः कमिटी बनी तथा उसने लगान के दरो का निर्धारण किया तथा बढ़ा हुआ दर वापस ले लिया। 
     
गांधी जी के लिए देश के अन्नदाता कभी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं थे। उनके लिए देश के अन्नदाता देश के पालनहार थे। गाँव की आर्थिक स्थिति इनके कंधों पर थीं। देश भूखे की समस्या के चपेट में ना रहें इसके लिए उनहोंने भारतीय अर्थव्यवस्था को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से रेखांकित किया। 

    इसलिए  देश के स्वतंत्रता के पश्चात् हमारे संविधान निर्माताओं ने गांधी जी के दूरदृष्टि सोच को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में सम्मिलित किया। 

लेकिन आज हमारे राजनेता या कहें तो युवा राजनेता कितना गांधी जी को पढ़कर उनसे सीखते हैं तथा अपने राजनीतिक जीवन में उतारते हैं । ये वो ही बता सकते हैं। 

  इसके बाद गांधी जी खेड़ा के किसानों की मदद की । तो वही 1920 में देश के लोगों से असहयोग आंदोलन से जुड़ने की अपील की, सभी भारतीयों अंग्रेजों का सहयोग ना करें,देश के युवा राष्ट्रीय स्कूल में पढ़ने जाए, अंग्रेजों द्वारा संचालित स्कूलों का त्याग करें। ब्रिटिश प्रशासन में कार्य कर रहे भारतीय सिपाही अपने लोगों पर गोली ना चलाए। 
  गांधी जी असहयोग आंदोलन को राष्ट्रीय मंच के तौर पर रखकर अन्य आंदोलन जैसे खिलाफत आंदोलन तथा क्षेत्रीय आंदोलन को इसमें सम्मिलित कर पूरे भारतीय को एकजुट कर दिये। अंततः अंग्रेजों को झुकना पड़ा लेकिन तभी चौरा - चौरी की घटना हो गयी जो हिंसा का रूप ले लिया जिसके कारण गांधी जी आंदोलन को वापस ले लिए। आंदोलन वापस लेने के कारण गांधी जी को आलोचना का भी सामना करना पड़ा। 
      गांधी जी का मकसद था भारतीय को एकजुट करना बिना हिंसा के अहिंसा के मार्ग पर चलकर वो चाहते थे कि भारतियों पर लाठियां और गोलियां ना चले यदि एकबार बर्बरता से दमन हुआ तो फिर आंदोलन को खड़ा करने मे काफी लंबा वक्त लगेगा। 
  
   
          

             

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